आधुनिक शरत चन्द्र चैटर्जी१

हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो,
जो भला बुरा सब कहा तुम्हे,उसको तुम दिल से विदा करो।

कहते होगे तुम भी ये ही,क्यों मैं वापस आ जाता हूँ,
मन के विचार प्रेषित करके,क्यों तुम्हे और उलझाता हूँ,
मैं खुद बेबस,मुझ प्रेम विवश को यादों से ना जुदा करो,
हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो।

अपने कथनों की क्षमा हेतु, मैं पुनः यहां वापस आया,
कड़वी बातें प्रतिपल कहकर ,सुकुमार हृदय को दुखलाया,
बातें ये सब आभासी हैं, इनको मन से अब रिहा करो,
हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो।

यह जन्म दिया तुमने जग को ,पर पुनः यहां वापस आना,
इस प्रेमसुधा के याचक को,आकर तुम गले लगा जाना,
मैं विरह में अपने खो जाऊं, तुम कर्म में अपने रमा करो,
हे मित्र मेरे अब चलता हूँ ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो।

प्रिय ब्रह्मांड मित्र !ये मेरे अंतिम शब्द आपको अर्पित।आप से क्षमा याचना हेतु वापस आया था क्योंकि बहुत कुछ कह दिया था आपको।अब हमेशा के लिए जा रहा हूँ।आप की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।तत्पश्चात मुझे आज्ञा दीजियेगा।ये चंद्र अब अपने आकाश में खोने जा रहा है।आप की प्रभा वितरित होती रहे इसी शुभाशीष के साथ।

आपका चंद्र।
पुनश्च
"तुम मुझसे पृथक होंगे तब न जाओगे"...
तुम्हारा
प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"
आधुनिक चंद्र

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