तुम और तुम्हारा साथ!

अब तुम मेरे बहुत करीब हो
जबकि तुम हो बहुत दूर....
अब तुम्हारे साथ की भी किंचित
परवाह नही मुझको...न चाह ही है।।

दुनिया की रश्मों में इतनी हिम्मत नही
दो प्रेमियों को जुदा कर सके...
बस तुम ही हिम्मत हार गए..
तो मैं क्या करूँ...रोऊँ।।

रोने से आँखे सुंजेगी जरूर
किन्तु आंसुओं से पवित्रता भी फैलेगी
स्वयं की खुश्बू महकेगी
अकेले होने का आलम खिल जाएगा।।

गम-खुशी-प्यार ये सब कुछ वक्त के सहयोगी हैं
तदुपरांत तन्हा रास्ता और तन्हा मैं
मेरी राह ही मेरी हमसफ़र हुई
अब तुम मुझसे दूर नही!।।

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