ख़त..६

प्रिय!

२० दिन के अस्वस्थ काल,
आंधी-तूफ़ान को प्रत्यक्ष करने के बाद।
आज आपको एक पत्र लिख रहा हूँ,हालांकि ये आपतक पहुंचेगा कि नही ये तो विधाता के वश में हैं।

मुझे अपनी उत्कंठायें प्रेषित करनी है सो कर रहा हूँ
ईश्वर के अनुकम्पा से मुझे देवियों के सानिध्य में जाने के हजारों अवसर मिलते है,मिल रहे भी हैं!
किन्तु आपके पवित्र एहसास से क्रमवार सभी कुछ वक्त में विसर्जित हो जाते हैं।

कोई प्रारब्ध होगा मेरा और आपका जिसके वजह से हम मिल लेते है,अंतराल के बाद।
आपने मेरी डायरी में कुछ शब्द लिखें
धन्यवाद उसके लिए!

फिर भी आपसे कोई सम्बन्ध नही
हमारा सम्बंधित होना सम्बन्धा-अतीत है।
मेरी एक प्रार्थना है आपसे कि मेरी मृत्यु तक आप स्वतः मेरे पास आकर अपने सानिध्य का अवसर दीजिएगा।।

क्योंकि निःसंदेह कुछ अतिविशिष्ट संयोग है हमारा
ये कहें कि कोई हेतु है प्रकृति का।

निश्चल हृदय से कहता हूँ
कि आपको बन्धन में नही सम्बंधित होना है।

जिस तरह उपनिषद में बालक गुरु के प्रत्यक्ष रह कर उत्तम हो जाता है, बस वैसा ही समझिए!

आपकी अतिकृपा होगी
आभार! ,इसे पढ़ने के लिए।।

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