आधुनिक शरत चन्द्र

हे दिनकर!तुम अंधेरों में अपनी ज्योति बिखरा देना,
करके प्रभात उज्ज्वल-सा,सारे जग को तुम चमका देना।

रात्रि पहर की निद्रा में ,तल्लीन तुम्हारा मित्र यहां,
जग जाओ गर पहले तो ,इसको भी तुम साथ जगा देना।

 तन मन का कल्मष सब धुलकर तुम प्रांजल गात बना देना,
गर गहन नींद में सोया हूँ, जल की बूंदें बरसा देना।

फिर साथ चलेंगे मैं और तुम,जीवन के पथ पर हंसते हंसते,
इस पंथ को मेरे पुष्पयुक्त और शूलरहित करवा देना।

विहगों संग हम कलरव करके,सुंदर उपवन फिर चहकायें,
रोते रोते सदियाँ बीतीं,अब हमतुम फिर से मुस्कायें।

हम सखा रहें हैं जन्मों के ,रहते थे प्रतिपल हमसाये,
तुम ढूंढो अपनी रजनी को,मुझको प्रभात भी मिल जाए।


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