संकल्प पुष्प!

रह-रह कर संकल्प सध रहे
रह-रह कर मैं तोड़ रहा हूँ।

टूटा-टूटा सारा सपना
पल-पल-क्षण-क्षण जोड़ रहा हूँ।

जुड़ जाए या तुड़ जाए
फर्क नही इसका मुझपर है..
मैं तो बस दायित्यों का अपने
शत-प्रतिशत वहन कर रहा हूँ..

पुष्प बो रहा हूँ मैं
बंजर-बंजर रेगिस्तानों में
तुम सब से कुछ चाह नही है..
अपने-अपने काम करो,सब
मैं मुकम्मल तन्हाई में...
अंगड़ाई में रुस्वाई में।।


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