नीर
समय? ये भी कोई चीज है
एक मुसाफिर जा रहा है...
और कहीं पे आ रहा है
बीच मे है कुछ नही बस
संगी-साथी मरहमी हैं
किन्तु है ठहरा नही कुछ
चल रही है ये फिजा...
क्यों है? किसको है पता..
कुछ लिखावट ऐसी है
जो बाद में समझूंगा मैं
मैं नही समझा रहा
पदचिह्न छोड़े जा रहा।।
राह में है कुछ मुसाफिर
ऐसे भी मुझको मिले..
वो मिले या न मिले
ये और बात है...पर मैं?
मिले और गले मिले जा रहा
आनन्द मिलन के गीत गाते जा रहा।।
सदियों से कइयो ने लिखी
है अधूरी दास्तां... मैं भी
कोशिश में हूँ कि...
इक पूरी तो कर जाऊं यहाँ...
ज़िद ये पूरी हो गयी.
नज़रे मिली जिस दिन मिरी..
तुमको हो या हो न
ये एहसास मुझको हो गया
रास्ते का एक मुसाफिर
रास्ते में खो गया....
तुमको पीया है मेरी नज़रो ने इतना हे प्रिये
हर तरफ श्रृंगार का मंजर मुझे दिखने लगा
खो दिया हूँ इश्क़ में सारी जमा पूंजी यहाँ
पा लिया नयनों में तेरे पल में ही सारा जहाँ...
माना मैंने धीर की,तुझमे कमी कोई नही
मैंने भी तो धीर का निर्माण है छोड़ा नही
प्रिय-मिलन में कोई भी हो पथ मुझे मंज़ूर है
तुमपे कोई आंच आये ऐसा हो सकता नही
रिश्ता ये जन्मों का है मैं छोड़ सकता हूँ नही
तुम करो कुछ भी तुम्हे मैं रोक सकता हूँ नही
मेरा वश बस मुझपे है....मैं तुम्हे
छोड़ सकता हूँ नही।।
कोई चाहत है नही तुमसे मुझे मेरे प्रिये
है खुदा से एक मिन्नत तुम सलामत ही रहो...
"नीर" का है सार बस इतना-सा प्रिये
तुमतक आने तक सहारा दे दिया पत्थर मुझे..
खुद बिखर है गया जिस बेशकीमती पत्थर का वजूद
खमोशी से उसने मोहब्बत में खुदी लुटा दी
नी....र एक यात्रा है जहाँ काव्य और गद्य का संगम हो जाता है।सारे भाव संघनित हो जाते है...
औऱ कभी-कभी आंसुओं की वर्षा होती है...
जिससे नीर लोगों की प्यास बुझाता रहे..।
एक मुसाफिर जा रहा है...
और कहीं पे आ रहा है
बीच मे है कुछ नही बस
संगी-साथी मरहमी हैं
किन्तु है ठहरा नही कुछ
चल रही है ये फिजा...
क्यों है? किसको है पता..
कुछ लिखावट ऐसी है
जो बाद में समझूंगा मैं
मैं नही समझा रहा
पदचिह्न छोड़े जा रहा।।
राह में है कुछ मुसाफिर
ऐसे भी मुझको मिले..
वो मिले या न मिले
ये और बात है...पर मैं?
मिले और गले मिले जा रहा
आनन्द मिलन के गीत गाते जा रहा।।
सदियों से कइयो ने लिखी
है अधूरी दास्तां... मैं भी
कोशिश में हूँ कि...
इक पूरी तो कर जाऊं यहाँ...
ज़िद ये पूरी हो गयी.
नज़रे मिली जिस दिन मिरी..
तुमको हो या हो न
ये एहसास मुझको हो गया
रास्ते का एक मुसाफिर
रास्ते में खो गया....
तुमको पीया है मेरी नज़रो ने इतना हे प्रिये
हर तरफ श्रृंगार का मंजर मुझे दिखने लगा
खो दिया हूँ इश्क़ में सारी जमा पूंजी यहाँ
पा लिया नयनों में तेरे पल में ही सारा जहाँ...
माना मैंने धीर की,तुझमे कमी कोई नही
मैंने भी तो धीर का निर्माण है छोड़ा नही
प्रिय-मिलन में कोई भी हो पथ मुझे मंज़ूर है
तुमपे कोई आंच आये ऐसा हो सकता नही
रिश्ता ये जन्मों का है मैं छोड़ सकता हूँ नही
तुम करो कुछ भी तुम्हे मैं रोक सकता हूँ नही
मेरा वश बस मुझपे है....मैं तुम्हे
छोड़ सकता हूँ नही।।
कोई चाहत है नही तुमसे मुझे मेरे प्रिये
है खुदा से एक मिन्नत तुम सलामत ही रहो...
"नीर" का है सार बस इतना-सा प्रिये
तुमतक आने तक सहारा दे दिया पत्थर मुझे..
खुद बिखर है गया जिस बेशकीमती पत्थर का वजूद
खमोशी से उसने मोहब्बत में खुदी लुटा दी
नी....र एक यात्रा है जहाँ काव्य और गद्य का संगम हो जाता है।सारे भाव संघनित हो जाते है...
औऱ कभी-कभी आंसुओं की वर्षा होती है...
जिससे नीर लोगों की प्यास बुझाता रहे..।
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