अब बस!

काश कि कोई "काश"होता!
दरम्यान हमारे तुम्हारे!
किन्तु अब आस भी नही तो
"काश!" कैसे होगा!
हा अनन्त हो तुम अब मुझमे
साथ नही है बस ये जानो!
सत्य ये भी है कि मेरी पात्रता भी नही है साथ की!
और अब......बिखरा हुआ-सा मैं
न जाने कितने चेहरे गुजरे हैं मुझसे होकर!
न जाने कौन-से रास्ते होंगे
न जाने कौन सी मंज़िल होगी!
तुम हो! तुम रहोगी मुझमे!
एक द्वीप जैसे रहता है सागर में ही किन्तु जुदा-जुदा!
न जाने तुम कौन थी
न जाने राह कौन थी!
मै तो गया ! मय में हु मैं
भय नही है कोई लय में हूँ मै
न राधा न रुक्मिणी कोई नही मिली
मैं तो मीरा के संग हो चला!
नही मैं कृष्ण न ही मैं राम!
अदना-सा आदम!
जाओ तुम दूर इस सागर से द्वीप
काश की कोई अगस्त होता
जो द्वीप को मुकम्मल कर देता!

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