शरत चन्द्र...

नारी तुम हो जननी जग की,तुम ही तो जग माता हो,
करुणा की झंकार तुम्ही हो,तुम ही प्रेम प्रदाता हो।

तुमसे ही ये सृष्टि सारी,तुम विधना की छाया हो,
शक्ति  तुम ब्रह्मांड की सारे,तुम ही सारी माया हो।

तुमसे जग में  व्यापी ममता,तुम हो निर्मल कोई कविता,
प्रेम तुम्हारी ही प्रतिछाया,फिर भी सहती जग -निर्ममता।

तुम ही सीता, तुम सावित्री ,रानी लक्ष्मीबाई हो,
तन मन का सब कल्मष धुलने,गंगा बनके आयी हो।

दुर्गा काली रूप तुम्हारे ,जग में पूजित होते हैं,
फिर क्यों मन मर्दानों के ,तेरे प्रति दूषित होते हैं।

हे माँ ! हे भगिनी !हे भार्या !अब अन्याय न तुम सहना,
कोई साथ न हो तब भी तुम इन सबसे लड़ते रहना।

तेरी पावन छाया से ,ये जग पावन हो जाएगा,
नर ,नारी को पूजेगा ,और नैतिक उन्नति पायेगा।

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