गंवार
मानवता बस धर्म है जिसका,जाति है जिसकी केवल प्यार,
कर्मपथी वह निर्मल निश्चल ,कहते जिसको सभी गंवार।
छल से जो खुद छला हुआ है,प्रतिशोध नही जिसको स्वीकार,
कर्मपथी वह.....
बल उसका जग हित के मद में,सपने भी करता साकार,
कर्मपथी वह.....
प्रेम सुधा छलकाने वाला,प्रेम ही है जिसका उपचार,
कर्मपथी वह ......
खुशनसीब हूँ पाकर तुमको,कह कर तुमको अपना यार,
कर्मपथी वह....
शरत चन्द्र(आधुनिक)

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