यूँ ही!(एक श्रृंगार पुकार)

यूँ ही कुछ प्रारंभ करू मै
तुम भी कुछ समझाओ ना
भूली-बिसरी बाते हैं बस
तुम तो सांसो में चलती हो।

क्या लिख दू? कैसे लिख दू?
कि तुम दौड़ी चली आओ ना
मन मेरा वीरान हुआ-सा
सहम-सहम के रह जाता
जन्म-जन्म की सारी तृष्णा
पल भर में मिटवाओ ना।।

इतना सन्नाटा जीवन मे
तूफ़ान पुकारता है....आओ प्रिय
आ जाओ प्रिय मन कि
मैल धुलाओ ना। वैराग्य!
जो उपजा है मन मे
उसको अखण्ड बनवाओ ना।।

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