एक दुनिया समानांतर!
क्या हम ऐसे संसार का निर्माण कर सकते हैं जिसमे युद्ध न हो,जिसमे अत्याचार न हो,जिसमे देशों की सीमाएं न हो,कोई कहीं भी आ जा सके,कोई बंधा हुआ न हो,पूरा विश्व प्रेम से सराबोर हो! ये कल्पना है या ये कह सकते हैं कि दिवास्वप्न है,प्रतिशत में इसका अस्तित्व दशमलव के बाद अनेको शून्य के बाद कहीं जाकर है! है, ये निश्चित है,हो सकता है ये निश्चित है,इसका अस्तित्व है जरूर और यदि रच मात्र भी हमें ये दिख सकता है तो हमे इस ओर सोचना चाहिये हालांकि वर्तमान में इसके विपरीत ही सारे अनुसन्धान एवं पृथ्वी का समस्त श्रम लगा हुआ है इससे कोई भी नकार नही सकता!
लेकिन जिस रंच मात्र की खोज एवं प्रसार की यहाँ बात हो रही है यदि उस ओर मानवता अग्रसित हो गयी तो तस्वीरें बहुत अलग हो सकती है पूरी दुनिया समृद्धि की नित नूतन शीघ्र गति से एक एक सीढ़ी चढ़ सकती है!
लेकिन ये मानव का मानव मात्र हो जाने से होगा जो दिखता तो बहुत साधारण है किंतु साधारण चीजे बहुत असाधारण हो गयी है दुनिया के विकृत सभ्यताओं में!
यदि मानव मानव हो जाये तो वो अतिमानव से ज्यादा चमत्कारिक हो सकता है! इसके लिये अध्यात्म और विज्ञान के सम्यक सम्मेलन होने आवश्यक है...और इसके लिए बूंद भर ही सही जागृत लोगों को सार्थक प्रयास करने होंगे!
अत्यधिक कठिन है सरल होना!
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