हंसिनी!

मैं अपने पुत्र को लेकर
छत पर सो रहा था ज्येष्ठ
की रात्रि में,तुम अजनबी थी,
मेरे लिए एवं मैं भी तुम्हारे लिये,
मैं सोता नही हूँ कभी भी,हाँ
विश्राम करता हुँ, तुम्हारा आना
तुम्हारा चद्दर उठा कर मच्छर से
बचाने के लिये मुझे एवं पुत्र को
ढककर फिर वहां से हट जाना!

मैं मौन देखता रहा हे हंसिनी तुमको
और अचानक एक तरंग उठी मेरे
अंदर,मैं परिचित हुआ उसी क्षण आपसे!
हे हंसिनी तुम महाश्वेता हो!

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