प्रेयसी
शून्य देखा तुम्हे,सबसे पहले,
फिर थोड़ा तो आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा,
लेकिन ये कुछ मायने नही रखता,
फिर अकस्मात, ये अकस्मात तो कह दिया,
लेकिन प्रक्रिया लंबी है,
भाव बनने प्रारम्भ हुए,
दो तरह है,प्रदर्शन का,एक तुम्हारे,
पिता की तरह एक तुम्हारे पुत्र की तरह,
दोनों साँचो में तुम ढलती हो,
अज़ीब है लेकिन सच है,
भाव पुनः प्रारंभ अब थोड़ा परिवर्द्धन,
अब निर्भीकता को अग्रसर मैं भी,
तुम भी तब तो योग संयोग हो गए,
पुनः भाव और कल्पना,
कल्पना की गहनता गहराती है,
फिर तुम समक्ष हो,तुम्हारा चाहना
यहाँ कोई मायने नही रखता,
अब मैंने सम्वाद प्रारम्भ किया,
तुम से भाव फिर गहन हुए,
तुमको भी शायद बेशब्री रहती अब,
अब ख़्वाब तुम्हारे औऱ हमारे,
दो केंद्रों से हो कर एक केंद्र की,
तरफ यात्रा करते है,
तुम्हे प्रस्तावित करने की
आवश्यकता नही,
की तुम प्रेयसी हो ,
प्रेयसी!
फिर थोड़ा तो आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा,
लेकिन ये कुछ मायने नही रखता,
फिर अकस्मात, ये अकस्मात तो कह दिया,
लेकिन प्रक्रिया लंबी है,
भाव बनने प्रारम्भ हुए,
दो तरह है,प्रदर्शन का,एक तुम्हारे,
पिता की तरह एक तुम्हारे पुत्र की तरह,
दोनों साँचो में तुम ढलती हो,
अज़ीब है लेकिन सच है,
भाव पुनः प्रारंभ अब थोड़ा परिवर्द्धन,
अब निर्भीकता को अग्रसर मैं भी,
तुम भी तब तो योग संयोग हो गए,
पुनः भाव और कल्पना,
कल्पना की गहनता गहराती है,
फिर तुम समक्ष हो,तुम्हारा चाहना
यहाँ कोई मायने नही रखता,
अब मैंने सम्वाद प्रारम्भ किया,
तुम से भाव फिर गहन हुए,
तुमको भी शायद बेशब्री रहती अब,
अब ख़्वाब तुम्हारे औऱ हमारे,
दो केंद्रों से हो कर एक केंद्र की,
तरफ यात्रा करते है,
तुम्हे प्रस्तावित करने की
आवश्यकता नही,
की तुम प्रेयसी हो ,
प्रेयसी!
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