गति

हा मालूम है मुझे ,तुम्हे,
निशानी चाहिये,सब्र करो,
भरूँगा तुम्हे पहले भावों से,
फिर सुलझाऊंगा तुम्हारी जुल्फों के
साथ तुम्हारे मन को,उर को,
फिर उतरूंगा धीरे धीरे,
प्रेम सरोवर में,तुम्हे लम्हा लम्हा,
निर्भय और अभय करता जाऊंगा,
अभय होते ही तुम खुद जुड़ जाओगे,
अनन्त सत्ता से,आराम देते हुए तुम्हे,
इतना योग्यतम की ओर अग्रसर करूँगा,
अनन्त का एक ,एक आगन्तुकआएगा,
खुद तुमतक मेरी प्रतिच्छाया!
जो तुम्हे मुक़्क़म्मल करेगा
थोड़ा सब्र तो करो!

Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!