आकांक्षा

कुछ पल में ही,पल पल भर में
एक-एक शब्दों को पीरो-पीरो
एक महाकाव्य लिख डालूँगा
संघर्ष कठिन है मनन किया,
फिर आत्मशक्ति को जतन किया।।

धीरे धीरे खुद को खोकर
इस मार्ग निरन्तर चलना है
कुछ कष्ट विषाद, अनन्त अवसाद
न बाधा बन पाएंगे,माला बनेगी दिव्य
एक दिन ज्ञातव्य नही है ये भी
किन्तु मुझे बहकर-चलकर
खुद को पाकर खुद को खोकर
एक राह पे चलते जाना है;
एक मार्ग नया दिखलाना है।।

सब को मयूर के पंख सदृश,
कोयल की कू-कू भाव अदृश्य
निज को समेट विस्तीर्ण किये
इस युग में पुष्प खिलाना है।।

हूँ गुनहगार,कलंकित भी
ये बात पता है मुझको भी
फिर एक कलंक को आलिंगन से
कभी नही लगाना है
तुम सब को उस ओर अग्रसित कर
मुझको ये पाप मिटाना है
तुम जैसे ही कुछ मैं भी हुँ
बंदीगृह तुम,मैं मुक्त असीम
भावो को गढ़ते गढ़ते मुझको
दुर्भावों को मिटाना है।।

ना मैं मील का पत्थर
ना तुम ही मुसाफिर हो,
बस राह है यहाँ, सांसे गिनाना है
तुम को कलुषित नही करना है
बस खुद का मार्ग बना बनाना है।।

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