दृश्य
प्रत्येक प्रश्न का समाधान प्राप्त हो गया,अब निर्झरिणी हुँ मै,
थोड़ा शीत थोड़ा उष्ण मन से पार, मन मे ही स्थित होकर महामाया से पार होकर,प्रस्फुटित हुआ,अनन्त मे, सर्वस्व स्थित प्रस्थिति सम्यक समीक्षा कर रहा,
आगाज हूँ,
न अंत हूँ,
मध्य हूँ और फिर,
तर गया हूं उस पार भी,
इस पार भी,
विस्तृत नही संकुचित नही,
मैं मध्य हूँ मै मध्य हूँ,
कोलाहल सभी अब भी समक्ष,
किन्तु है अब संतुलित,संतुलित! सन्तुलित।
विस्तृत हुआ सम्यक हुआ,
नभ है कि अब बारिश हुई,
सब रिक्त व्योम हुआ यहाँ,
विस्तृत हुआ विस्तृत हुआ।
थोड़ा शीत थोड़ा उष्ण मन से पार, मन मे ही स्थित होकर महामाया से पार होकर,प्रस्फुटित हुआ,अनन्त मे, सर्वस्व स्थित प्रस्थिति सम्यक समीक्षा कर रहा,
आगाज हूँ,
न अंत हूँ,
मध्य हूँ और फिर,
तर गया हूं उस पार भी,
इस पार भी,
विस्तृत नही संकुचित नही,
मैं मध्य हूँ मै मध्य हूँ,
कोलाहल सभी अब भी समक्ष,
किन्तु है अब संतुलित,संतुलित! सन्तुलित।
विस्तृत हुआ सम्यक हुआ,
नभ है कि अब बारिश हुई,
सब रिक्त व्योम हुआ यहाँ,
विस्तृत हुआ विस्तृत हुआ।
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