महामानवी!!
हे रजनी हे-हे! रजनी तुम हो जीवन की इक जननी
तुमसे मिलकर मैं
जीवन वृहता को जान सका।।
पहचान हुई मेरी खुदसे
मैं लघुता से प्रस्थान किया
विस्तृत इस जग की सुंदरता को
अपने भीतर स्थान दिया।।
मैं नितप्रति पल बस ये सोचू अब
तुम हो इक दिव्यकिर्ति...
मेरी ऊर्जा का ये प्रवाह
तुमको पल भर में..
देखना तुम...चंद्रशेखर की
शिखा से गंगा की धार निकाल...
इस जग की अधूरी प्यास को....
संतृप्त करेगा, औऱ स्मित ये तुम्हारा
मोहन को राधिका का दीवाना बनाकर
इक मधुर तान जब छेड़ेगा।।
जग इक लय में
लयबद्ध हुआ....
तुमने ये किसलय कर ही दिया।
तुमने खुद को विस्तीर्ण किया।।
ब्रह्माण्ड धरा पर परिलक्षित किया।।
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