मैत्री!
मैत्री एक भाव है ये भाव जिसने भी अपने अंदर विकसित किया वो सम्राटों का सम्राट होगा। जैसे जैसे आप मैत्री पर ध्यान देंगे और आपका ध्यान घनीभूत होगा आप सम्राट से महा सम्राट,चक्रवर्ती सम्राट बनने की तरफ भी घनीभूत है। ये ही विजय का सूत्र है। आपके भाव,विचार,स्थूल शरीर,सूक्ष्म शरीर एवं आस पड़ोस में सबको मित्र बनाइये, मित्र बनाने से ज्यादा मैत्री विकसित करिये। मैत्री को ही सूत्र बनाइये।
एक दिन इस यात्रा में किसी भी क्षण जब मैत्री घनीभूत होकर पराकाष्ठा पर पहुँचेगी बस उसी बिंदु पर आप 'मैत्रेय' हो जाएंगे।
पृथ्वी का अगला सम्राट मैत्रेय का उदय होने ही वाला है। आप के या मेरे या किसी के भी भीतर।
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