साथी..4

तुमसे सीखा निर्मल होना,
और क्षमादान का महात्म्य
कुटुम्ब में प्रेम का भाव,
और प्रेम में भी होता है त्याग!

माँ से स्नेह,पिता से दुलार
औऱ निज का सम्मान,
हर क्षण प्रेम में डूब कर,
कैसे सहते है अपकार!

योगेश्वर का प्रतिरूप हो तुम,
हर मार्ग प्रदर्शित करते हो,
जब जब कठिनाई आती है!
निःस्वार्थ समर्पित रहते हो।।

मेरे हर ख्वाहिश का प्यारे,
कितना ख्याल तुम करते हो!
मैं गर विचलित होता मानवता से!
उस वक़्त गुरु स्तम्भ बने तुम!

ये साथ बहुत ही पावन है,
सच कहूं तो एक इबादत है,
पूर्ण जागरण होता है!
ये साथ बड़ा मनभावन है।।

तुमसे सीखा है अखण्डता,
त्याग की सारी महानता,
कि पाना ही सब कुछ न होकर,
खोना भी प्रेम समर्पण है!

कितना मधुर हुआ हूँ मैं
तुमसे मिलकर प्यारे साथी!
सारे झंझावत त्याग के मैं
मानव कि सेवा सुश्रुषा में!

कर दूं समर्पित जीवन ये,
सच्ची श्रद्धांजलि प्रेम की
मैं तुमको तब दे पाऊंगा, मीत!
हे नाथ मुझे तुम सम्बल दो

व्यवहार और आचरण से
मैं एक उपहार दे पाऊँ!
साथी के महत्व को!
स्वर्णाक्षर से संसार लिखे!

इतनी करुणा से भरो मुझे
हे! नाथ ये मेरा निवेदन है..
अपकार करे गर कोई भी!
उपकार मैं उसका कर पाऊँ।।

सच्ची श्रद्धांजलि देकर मैं
एक दिव्य प्रेमग्रंथ लिख दू!

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