साथी..3
तेरे साथ जो भी बीता,
वो वक़्त नही था,कुछ भी हो!
मैं डूबा था भवसागर में,
तुम अन्तस् की गहराई में।।
प्रकृति का स्वागत देखो!
टिप-टिप बरसाकर प्रेमाश्रु!
दो मन,दो तन के मिलन को!
शास्वत करने का प्रण लेकर।।
उस अनुपम समय जो बीता प्रिये!
वो वक़्त नही था कुछ भी हो!
साँसे मिलकर एक ही तो थी....
जो गीत निकले...अप्रत्याशित!
हम एक हुए थे दो होकर..
दुनिया की रस्मे विस्मृत कर..
उत्तप्त हृदय को सिंचित कर...
हे! नाथ!...अद्भुत आनन्द दिए!
उस वक़्त हुए हम भार मुक्त,
करुणा, प्रेम और श्रद्धा युक्त।।
हे नाथ तुम्हे अनवरत नमन,,
यूँ किये दीन पर महत करम।।
है आज हृदय उद्घोष कर रहा..
जो दुख था..मेरा लोभ रहा..
सारे भावों को यूं पिया..
मानो संगम की सुधा थी वो..
इतने पावन प्रायोजन,,को
निःशब्द नमन हे नाथ तुम्हे!!
"मैं" हुआ विसर्जित मेरा अब!
हे नाथ मेरा उद्धार करो..
हर क्षण रहकर साथ मेरे..
हे नाथ मेरा उद्धार करो।।
वो वक़्त नही था,कुछ भी हो!
मैं डूबा था भवसागर में,
तुम अन्तस् की गहराई में।।
प्रकृति का स्वागत देखो!
टिप-टिप बरसाकर प्रेमाश्रु!
दो मन,दो तन के मिलन को!
शास्वत करने का प्रण लेकर।।
उस अनुपम समय जो बीता प्रिये!
वो वक़्त नही था कुछ भी हो!
साँसे मिलकर एक ही तो थी....
जो गीत निकले...अप्रत्याशित!
हम एक हुए थे दो होकर..
दुनिया की रस्मे विस्मृत कर..
उत्तप्त हृदय को सिंचित कर...
हे! नाथ!...अद्भुत आनन्द दिए!
उस वक़्त हुए हम भार मुक्त,
करुणा, प्रेम और श्रद्धा युक्त।।
हे नाथ तुम्हे अनवरत नमन,,
यूँ किये दीन पर महत करम।।
है आज हृदय उद्घोष कर रहा..
जो दुख था..मेरा लोभ रहा..
सारे भावों को यूं पिया..
मानो संगम की सुधा थी वो..
इतने पावन प्रायोजन,,को
निःशब्द नमन हे नाथ तुम्हे!!
"मैं" हुआ विसर्जित मेरा अब!
हे नाथ मेरा उद्धार करो..
हर क्षण रहकर साथ मेरे..
हे नाथ मेरा उद्धार करो।।

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