पीकदान!

एक सज्जन व्यक्ति,और विद्वान व्यक्तित्व था उनका,आज भी ज्ञान की अलख जगा रहे होंगे जहां भी होंगे...उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, और वो भी ज़िन्दगी के विभिन्न आयामों एवं तत्व के भी विभिन पहलुओं की,मैं बात कर रहा हूँ अपने प्राचार्य डॉ सत्यकाम आर्य के बारे में!
वो मुझे स्नेह करते थे,और मैं उनको श्रद्धा भरी दृष्टि से देखता था क्योंकि उनका व्यक्तित्व वाकई बहुत स्निग्ध एवं सौम्य था!
एक बार मेरी उनसे चर्चा हो रही थी पान मसाला, गुटखा, सुर्ती इत्यादि से रंगे हर कार्यालयों के स्वच्छता के सन्दर्भ में...
उन्होने मुझे एक मार्ग सुझाया जो मुझे समीचीन जान पड़ता है,
उन्होंने कहा कि ये बुरी आदत है
और आदत जाने में वक़्त लगता है एवं हम किसी के निजी जीवन मे ज्यादा हस्तक्षेप भी नही कर सकते क्योंकि सबको अपना जीवन जीने का अधिकार है;किन्तु एक कार्य हम कर सकते है जिससे इन उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाली गन्दगी से  बचा जा सकता है!
हम लोगों को प्रेरित कर सकते है कि वो एक पीकदान लेकर चले और रोज शाम को सोते वक़्त उस पीकदान को स्वच्छ करलें, जिससे उनका शौक,आदत,या जो भी जो वो भी पूरा हो जाएगा और पब्लिक प्लेस भी स्वच्छ रहेगा।
मैं उनके इस सुझाव से सहमत था,क्योंकि इससे अच्छा मार्ग मुझे नही लगता कि कोई हो सकता है।

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