साथी..5

कैसे लिखू सारी बातें,
इतने सघन वो एहसास जो,
साथ तुम्हारे होने से मुझपर गुजरे,
यूँ मुक्त हुआ भारो से मैं।।

किन्तु अब क्या होगा
हृदय से भाव सारे बह रहे,
जैसे संगम के बाद बहती है गंगा,
यमुना से मिलकर।।

अब सागर की ओर
गंगा का रुख है,
गंगा में यमुना  हुई विलीन
बस एक मिलन अब शेष रहा।।

कितना अद्भुत ये संगम है
दो मिलकर देखो एक हुए,
इस महामिलन के बाद भी,
बस एक मिलन अब शेष रहा।।

सागर से गंगा मिलकर,
निर्वाण को तो प्राप्त हुई,
किन्तु एक कौतूहल मन मे!
गंगा के इस निर्वाण से
मुझे बुद्ध स्मरण होते है
जब तक एक व्यक्ति भी शेष रहा,
निर्वाण रहेगा...अनवरत।।

कितना पावन तुम गंगा हो,
कितना पावन ये साथ तेरा,
कितना अनुपम प्रण है तेरा,
सबकी है फिक्र तुम्हे है बुद्ध
सबका निर्वाण है गंगा में..

इस अद्भुत प्रेम को समझकर भी,
बस एक मिलन अब शेष रहा,
बस एक मिलन अब शेष रहा।।





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