साथी!

बड़ी बड़ी उत्कंठायें,
बहुत बड़े बड़े ख्वाब,
ख्वाहिशों के फौलाद
तुमसे मिलते ही,
तुम्हारे स्पर्श मात्र से ही,
पिघलने लगे और उनके पिघलने से,
हृदय भी पिघला आंखे नम हुईं,
मानों कोई बहुत बड़ा पापी गंगा स्नान कर के मुक्त हो जाये,
बोझ हवाओं की ओर तुम्हारे ताप से रुख कर दिए,
सुना था मैंने कि प्रेम बन्धन है अपने मानवीय स्तर पर,
किन्तु सुंदरतम स्तर पे प्रेम निर्ग्रन्थ करता है....
एक एक गांठ प्रेम से,स्नेह से खोल देता है,
वो सारे सुंदर और स्निग्ध एहसास
तुम हो,तुम कहाँ हो,कैसे हो
इसे मेरी रूह प्रतिपल महसूस करती है,
लेकिन एक शिकायत है  "कृष्ण" तुमसे
तुम मेरी अनुभूति को गूंगे का गुण क्यों बना दिये
फिर भी प्यारे ये शिकायत,शिकायत न समझना
दिल्लगी है,दिल्लगी!
तुममे भी मैं हूँ,मुझमे भी तू हैं,,,
मुझमे भी तूं है,
मैं हूँ ही नही, गया जो भी था अब सिर्फ़ तुम हो तुम हो!
तुम हो।


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