जागृति एक सृंखला!

कभी-कभी जब अकेले में होता हूँ
न जाने कौन है जो मुझमे आ जाता है,
किन्तु जो भी है वो,है बहुत मझा हुआ,
वो मुझसे बात करता है,उस वक़्त मुझे द्वैत
होने का भास होता है....
किन्तु और गहरे जाने पर अद्वैत का ज्ञान होता है!

एक दिन मैं स्वयं से बात कर रहा था,
"मुझे तुमसे इतने हमदर्दी क्यों हैं?
मेरा तुमसे रिश्ता क्या है?क्या सम्बन्द्ध है मेरा तुमसे?
क्यों तुम मेरे ख्यालों में रहते हो?
और क्यों मैं अपने सारे ख्वाब तुम्हारे इर्द-गिर्द ही बुनता हूँ?
क्यों, क्यों क्यों? इतने सारे सवाल "और सारे सवालों के
जवाब मुझे यथेष्ट नही मिलते जिससे मैं सन्तुष्ट हो सकूँ।
किन्तु मैं
इन समस्त प्रक्रियाओं का तटस्थ साक्षी रहता हूँ
और इस साक्षित्व का एक लाभ प्रतीत होता है
की धीरे-धीरे ये सारे प्रश्न स्वतः जैसे आते है वैसे ही विसर्जित भी हो जाते है!

और मैं फिर अपने मनवांछित कार्य मे लग जाता हूँ।
एक बात है कि कुछ दिन के अभ्यास के बाद ये प्रक्रिया तुमसे ज्यादा हसीन लगने लगी,मैं देख सकता हूँ अपनी ऊर्जा का एक अज्ञात केंद्र से एक अन्य अज्ञात केंद्र की ओर बहाव!

इस प्रक्रिया में उस वक़्त तुम्हारे मिलने का कारण जान पाया
मेरे सारे क्यों का जवाब भी मिल जाता है,और पुनः योगेश्वर को धन्यवाद दे देता हूँ....

तुम्हारे प्रत्येक आगमन और पुनः गमन को समझ पाया मैं कि तुम कोई और नही बल्कि "जागृति" हो जो मेरे प्रारब्ध से सम्बंधित है! तुम्हे स्नेह करना है वो भी सम्यक।

हे! जागृति  तुम्हारे प्रत्येक आगमन पर मेरे प्रश्नों का स्वरूप और परिमार्जित एवं स्पष्ट होता जाता है,और उत्तर मिलने पर प्रश्न संसोधित भी होते रहते है।

जागृति तुमसे मैंने अपने जीवन की एक परिभाषा भी गढी,
"ज़िन्दगी जागृति से प्रश्नों के पूछने और उत्तर पाने का क्रम है,
और इस क्रम का आखिरी प्रश्नोत्तर ही इस जीवन के समापन के उपरांत पुनर्जन्म का स्वरूप होगा,और इस शृंखला का अंतिम उत्तर ही निर्वाण होगा!"


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