घृणा!
मेरे जीवन का अबतक का एक अनूठा प्रयोग है ये कि जिस-जिस तथ्य,व्यक्तित्व या किसी अन्य वस्तु से मैंने घृणा किया, कालांतर में उसी तथ्य,व्यक्तित्व,और वस्तु को अपने अंदर समाहित पाया!
मसलन कबीर दास की पंक्तियां..
बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपमें,
मुझसे बुरा न कोय।।
अतः अब इसका बोध मुझे है,और मेरे समझ से बोध ही ऐसी अनुभूति है जिससे व्यक्ति मुक्त हो जाता है,अब मैं किसी भी परिस्थिति में स्थित व्यक्ति से सहज होकर मिल पाता हूँ बिना किसी पूर्वाग्रह के!
ये एक अद्भुत अनुभूति है
हे मेरी प्यारी अनुभूति तुम्हे कोटिशः धन्यवाद!
हे योगेश्वर आपकी माया को समझ पाना बहुत मुश्किल है! और सच है ये कि अब मुझे समझने में तनिक भी रुचि नही है! जो भी हो सब आपका प्रसाद समझ के मुझे प्रवाह में बहना है,और अब आपको कभी भी नही छोड़ना है!
हे प्रभु! तुमको कोटि कोटि प्रणाम!
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