साथी..6

कैसे मिला ये साथ,
उद्घोष जटिल है सरल नही!
किन्तु तुम्हारा प्रिय मिलन ये,
महामिलन का हेतु प्रिये!

यूँ तो एक दायरे में ये,
साथ नही बंधता, साथी!
न ऐसी कोई ईप्सा भी..
फिर भी हर बार हे! प्राण प्रिये!

रोम-रोम अनुग्रह से
भर जाता है,इस अद्भुत अनुग्रह
को स्वीकार करो,
ये तुमसे ही है!

अद्भुत रहस्य एक ये भी है
हर पुरूष प्रेयसी में,
माँ को ही ढूंढता है,
साथी तुम इसमे भी अव्वल!

कर दिए दिप को,
प्रज्वलित!
दिशा बदली वासना ने!
दृष्टि बदली आत्मा ने!

माफ कर पाता हूँ मैं,
सब पाप तुमसे मिलकर,
क्रोध सारे ताप सारे,
प्रेम परिवर्तित हुए!

ये साथ बहुत ही दिव्य सखी
ये बन्धन का मोहताज नही!
इतनी गहरी "अनुभूति" ये
अधिकारों के पथ-पार रही!

मैं तुच्छ कटोरा लिये खड़ा
एक भिक्षुक ही तो था पहले,
तुमने इतना विश्वास दिया,
और दानवीर का मान दिया!

योगेश्वर के और,
निकट होने का भान दिया!
नमन मुझे इस "साथ" को है,
और साथी के बलिदान को है।।


Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!