वन्दे मातरम!

मां के गर्भगृह से शैशव काल के समय तक की बातों में जो तथ्य स्मरण है मुझे वो एक तथ्य है,कि उस वक़्त मैं भयभीत होता था..तो एक बात से कि माँ मुझसे एक पल के लिए भी अलग न हो,
और वो भी अंधेरों में
सबसे ज्यादा, इसके अतिरिक्त कोई चाहत नही थी,
आज 24 वर्ष की यात्रा के उपरांत
मेरी मित्रता अंधेरो से हो गयी,
और वो भी इसलिये क्योंकि
अंधरो में घने अंधेरों में मैं शायद खुद से ज्यादा या ये कहिये की सम्पूर्ण रूप से मिलता हूँ, हांलाकि मेरी माँ को अक्षर ज्ञान नही है,किन्तु मैं मां को आजतक पीता हूँ, और रोज जब अंधेरा होता है तो मिलता हूँ खुद से तो शांत भाव से देखता हूँ कि माँ कहा तक मुझमे आ चुकी;और अब अभय भी हुँ क्योंकि पीते पीते माँ को ये ज्ञात हो गया कि अब माँ मुझसे अलग नही हो सकती अनन्त काल तक,ज्ञान मुक्त करता है,जो मुक्त न करे वो ज्ञान नही हो सकता,सूचना भले हो,ज्ञान नही हो सकता।
और अब उन तकनीकों की खोज जारी है जिससे मैं माँ को प्रसारित कर सकूँ, जिसदिन मैं माँ को सम्पूर्ण रूप से संसार मे प्रसारित कर लूंगा मैं मुक्त हो जाऊंगा!
और यही निर्वाण होगा!

वन्दे मातरम!

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