सन्देह और शक्ति
जहां जहां मैं व्यथित हूँ, या किसी को व्यथित कर रहा हूँ वहाँ-वहाँ मैं हूँ,और जहाँ-जहाँ शक्ति एवं सौंदर्य के साथ मैं अन्य की मदद कर रहा हूँ वहाँ वहाँ आप है।
मुझमे इसमे सन्देह है कि मैं अत्यधिक सौम्य एवं सुंदरतम ढंग से लोगों की मदद कर ही पाऊँ!
किन्तु मुझे आपके अस्तित्व और प्रक्रिया में असीम विश्वास है,कि आप प्रत्येक क्षण मेरे साथ है,और मुझमे स्थित हैं,औऱ मेरे प्रत्येक अनर्थ सूचक कार्यों को करने को आप अवरूद्ध करेंगे!
और मेरा ये विश्वास ही मेरी शक्ति है,आप ही मेरी शक्ति है,सर्व समर्पण आपको,मेरे अंदर आप हमेशा रहे और अनुचित मार्ग पर मुझे न ले जाएं ये आपसे सदैव विनती है मेरी!
इसलिए मैंने जो भी पाप कर्म किये हो,और मेरे किसी भी कार्य से यदि किसी की आत्मा को ठेस पहुंचा हो तो वो मेरे अंदर स्थित तामसिक या लोभमय वृत्ति के कारण ही हुआ है और ऐसा मैं स्वीकार करते हूँ निःसन्देह!
और चुकि मैं आप को अपने मे अवस्थित जनता हूँ, और समस्त सृष्टि में भी अतः मुझे ये भी विश्वास है कि मेरे द्वारा किये गए अपयशो में भी आपके संचालन प्रक्रिया का कोई हेतु होगा जो पूर्णतः समझ पाना मेरी सामर्थ्य में नही।
इसलिए हे-माधव,हे-कृष्ण मुझे आपसे कोई शिकायत नही है अपितु असीम विश्वास के साथ मेरे अंतर्मन की एक आवाज मैं सुनता हूँ जो आप ही का संदेश है,कि अंततक जब मेरा प्रस्थान होगा तो आपकी बनाई गयी व्यवस्था का,आपके गुरुकुल का मैं प्रिय विद्यार्थी रहूँगा वो भी आपके अनुकम्पा से!
मेरे प्रवाह का यही रहस्य है,
और आपमे मेरा असीम विश्वास मुझे मुझसे पूरी तरह मुक्त करके आपमे ही अवस्थित करेगा जब मेरी पहचान खोएगी!
आपको कोटि कोटि वन्दन और प्रेममय प्रणाम!
मुझमे इसमे सन्देह है कि मैं अत्यधिक सौम्य एवं सुंदरतम ढंग से लोगों की मदद कर ही पाऊँ!
किन्तु मुझे आपके अस्तित्व और प्रक्रिया में असीम विश्वास है,कि आप प्रत्येक क्षण मेरे साथ है,और मुझमे स्थित हैं,औऱ मेरे प्रत्येक अनर्थ सूचक कार्यों को करने को आप अवरूद्ध करेंगे!
और मेरा ये विश्वास ही मेरी शक्ति है,आप ही मेरी शक्ति है,सर्व समर्पण आपको,मेरे अंदर आप हमेशा रहे और अनुचित मार्ग पर मुझे न ले जाएं ये आपसे सदैव विनती है मेरी!
इसलिए मैंने जो भी पाप कर्म किये हो,और मेरे किसी भी कार्य से यदि किसी की आत्मा को ठेस पहुंचा हो तो वो मेरे अंदर स्थित तामसिक या लोभमय वृत्ति के कारण ही हुआ है और ऐसा मैं स्वीकार करते हूँ निःसन्देह!
और चुकि मैं आप को अपने मे अवस्थित जनता हूँ, और समस्त सृष्टि में भी अतः मुझे ये भी विश्वास है कि मेरे द्वारा किये गए अपयशो में भी आपके संचालन प्रक्रिया का कोई हेतु होगा जो पूर्णतः समझ पाना मेरी सामर्थ्य में नही।
इसलिए हे-माधव,हे-कृष्ण मुझे आपसे कोई शिकायत नही है अपितु असीम विश्वास के साथ मेरे अंतर्मन की एक आवाज मैं सुनता हूँ जो आप ही का संदेश है,कि अंततक जब मेरा प्रस्थान होगा तो आपकी बनाई गयी व्यवस्था का,आपके गुरुकुल का मैं प्रिय विद्यार्थी रहूँगा वो भी आपके अनुकम्पा से!
मेरे प्रवाह का यही रहस्य है,
और आपमे मेरा असीम विश्वास मुझे मुझसे पूरी तरह मुक्त करके आपमे ही अवस्थित करेगा जब मेरी पहचान खोएगी!
आपको कोटि कोटि वन्दन और प्रेममय प्रणाम!
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