मैं, तुम औऱ वो!

"संतुलन,कौन बनाएगा सन्तुलन, मैं, तुम की वो...मुझे लगता है कि कुछ दूर तक मैं,फिर जब मैं मुझसे ही हार जाता हूँ तो तुम और जब मैं और तुम दोनों के दायरे से बाहर आ जाती है बात तो वो..."
यहीं इसी बिंदु से पूरे विश्व का संतुलन स्पष्ट होता है,पश्चिम मैं!  मैं प्रधान रहा प्रारंभ से ही एवं पूर्व  "वो" प्रधान रहा है प्रारंभ से फलतः अनुसंधान और सन्देह पश्चिम की देन रहा है एवं श्रद्धा और अंधविश्वास पूर्व में प्रचलित रहा...
इसमे ध्यातव्य है कि "तुम" पश्चिम एवं पूर्व दोनो जगह मध्य में ही है...
और जिस दिन हम सम्यक "तुम" का अनुसन्धान करके सबको मर्म सीखा दिए,प्रचारित कर दिए उस दिन समग्र सृष्टि सम्यक सन्तुलित हो जाएगी।

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