पुकार..2

खुशी की शर्त बस यही है,
बाटने से ही मिलती है।।

कमी हो,या हो आधिक्य,
ये ऐसा मर्म जान लो तुम।
कोई रह न जाये भूखा,
कुछ ऐसा कर्म जान लो तुम।।

जरा निकलो घरौंदों से,
बुलाता तुमको भारत है,
जो  बच्चे भीख मांगते है,
जरा उनको भी परोसो प्यार!

ये छोटे-छोटे कंधे जो,
बड़े कामों में लिपटे है,
तुम्हारी राह देखते हैं,
कि कब निद्रा से जागोगे!

इन्ही में कोई विवेकानंद,
कोई कलाम छिपा होगा,
तुम्हारे छोटे से संकल्प में
राष्ट्र उत्थान छिपा होगा!

अरे छोड़ो मारा-काटी,
भरो अपने मन मे तुम प्रेम,
संकल्प भरो मन मे,
निखारो भारत के तन को!

और ये मर्म जान लो तुम
.....
खुशी की शर्त बस यही है,
बाटने से ही मिलती है।।

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