सौम्यता

जब से हम अपनी चेतना को समझते है,तबसे हमारे व्यक्तित्व में परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है,हमें ये एहसास होता है कि हम कोई यन्त्र नही बल्कि ब्रह्मांड के दिव्यता का एक अंश हैं,धन संसाधन, औऱ विभिन्न भौतिक संग्रह मात्र साधन हैं जीवनयापन के।
और फिर पहली दफा हम प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या,द्वेष,और विभिन्न षडयंत्रो से अपनी चेतना के विस्तार को वापस खींचते है,और उत्सव, प्रेम,और तात्विक तथ्यों की तरफ अग्रसर होते है।
हमे तब ये विधेय ज्ञात होता है कि हम सब रंगमंच के अभिनेता है और हम एक स्रोत के अलग अलग भाग है,और अन्तिम में हमे उसी स्रोत में ही मिल जाना है।
और फिर हम सौम्यत, स्निग्धता और करुणा का स्पर्श कर पाते है,और हमारा व्यक्तित्व विभिन्न सुगन्धों और दिव्य आभूषणों से युक्त हो जाता है।
हममे तब कोई भी शिकायत शेष नही रह जाती अपितु हम प्रतिपल अनुग्रह से परिपूर्ण हो जाते हैं,और प्रकृति का कलरव हम सुन पाते हैं;
और तब हमें एक तड़प भी होती है कि हम सबको नींद से जागॄत करें,क्योंकि हमें ये ज्ञात हो जाता है कि मूर्छा ही समस्त पीड़ाओं का हेतु है।
हमारे चेहरे एक विशिष्ट आभा से युक्त हो जाते है जो बहुत सहज ही हमारे जागे होने का प्रमाण देते है।
उस वक्त हम मुक्त हो जाते है,परिवार, समाज,राज्य के नियमों से।।
क्योंकि हम सौम्यता को प्राप्त कर लेते हैं!

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