Love--the beginning..
एक बात स्पष्ट है
कि ये तू-तू मैं-मैं प्रेम का स्वरूप नही,
हां प्रारम्भ हो सकता है,
क्योंकि ये एक बाहरी परिचय का रूप है,
और ये आवश्यक है,बिना इसके ज्यादातर प्रेम प्रारंभ नही होते।
किन्तु जब हम कुछ दूर चल पड़े
तो बात बदलने लगती है,
हम इशारों में ही बड़ी बड़ी बातें कर ले जाते है।
और इसका सबसे गहनतम स्तर हमें तब प्राप्त होता है,
जब हम बिन कुछ कहे समझने लगते है,
और यही प्रेम का उच्चतम रुप है
जहाँ मौन ही सम्वाद हो जाये!
इसके बाद का स्तर है,प्रेम से परमात्मा का मिलन
वस्तुतः प्रेम भी योग है! उस अनन्त परमात्मा से जुड़ने में
प्रेम सहायक है,बिना प्रेमानुभूति के परमात्मा तक पहुंचना अत्यधिक कठिन है.....
इसलिये तो प्रेम ही प्रस्फुटन है
प्रेम ही जागरण है! प्रेम ही योग है!
प्रेम ही प्रारंभ है।
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