पुकार एक शृंखला!
हे महामानव!
जब-कभी तुम्हारा ह्रदय
नेक कार्य करने के लिये
स्पंदित हो,
पहले तो उस स्पंदन की
गति को साक्षी भाव
से देखना!
किसी से भी सहयोग
के लिये मत कहना,
नही तो
तमाशा बन जाओगे!
चुपचाप उसकी तीव्रता को
अपने रोम-रोम में
संचरित होने देना!
और अकेले
अपने पथ पर
साधित कदम रखना!
अपने अनुभव से सीखना!
एक दिन ऐसा आएगा
जब ये जमाना
कदमताल करेगा तुम्हारे साथ!
और वो दिन जरूर आएगा!
सादर!
अध्यापक प्रभाकर
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