महाकाल!

सुनो पतीत प्रताणित प्राणी!
एक बात तुम्हें बताता हूँ...
तुम विनय नही तजना
चाहे कुछ हो जाये....
गर प्राणों में हो हलचल
शस्त्रों का आकर्षण मनभाये...
फिर भी हे प्यारे बन्धु तुम शस्त्रत्याग
नित-नित करना...
हाँ हृदयविहंगम ज्वारों को 
करबद्ध उबलने तुम देना...
कोशिश कर ज्वारों को तुम
तरल-प्रवाह में ले आना...
गगन को देखना तुम
तरल को देखना तुम
क्रोधग्नि को शीतल करना तुम
आहिस्ता-आहिस्ता एक क्षण आएगा...
गगन भी अश्रुजल बरसाएगा
तमस को शीतल कर जाएगा
और हाँ एक दिन एकांत में
रूदन होगा दुर्दांत...
उसे बस बह जाने देना...
गगन से कह जाने देना!
और इस मंत्रजप को बारम्बार होने देना

निर्णय वक़्त को करने देना
तुम बस मौन ही रहना...
देखना तुम,चमत्कार होगा
पीड़क का विनाश होगा!
अस्तित्व भस्मीभूत होगा
औऱ तुम्हे ज़रूर दिखेगा
वक़्त का न्याय, अन्याय के विरुद्ध!
अन्याय के विरुद्ध काल के विहंगम रूप को 
देखने का अवसर जरूर आएगा! जरूर आएगा!

अध्यापक प्रभाकर!

Comments

Unknown said…
उत्तम कविता

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