विरह में प्रेम

विरह में प्रेम संवर्द्धित होता,
जो-न विकसित हो, वो
वासना मात्र का प्रतिरूप होता है!

प्रत्येक विरह
प्रेम को मजबूत करने हेतु
ही है,और यदि वासना का हो अंश
तो उसे करने आता है विरह.. नष्ट!

विरह आत्मिक सम्पदा के
श्री वृद्धि हेतु होता है!
और कल्मष को धुलने हेतु होता है।।

विरह की अपनी एक विशिष्ट
रूपरेखा होती है
जो अध्य्यात्मिक ढांचे के श्रीवृद्धि
के लिए ही परमात्मा द्वारा रचित है।।

प्रेम सर्वत्र व्याप्त होकर
भी मनुष्य कृत होता है
और विरह प्रत्येक दशा में
परमात्मा का प्रसाद होता है!।।


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