अट्ठहास!

रास्ते-से जा रहा था,
गुरुवर से मिलने!
उनका सामीप्य ही मुझे
सहजावस्था में बहुत कुछ सीखा देता है।।

ज्योहीं रुस्तमपुर से आगे
रामगढ़-झील के निकट पहुंचा
चक्रवात प्रारम्भ हो गया
प्रचण्ड तूफान प्रारम्भ हुआ
मुझे गरीबों के झोपड़ियों की फिक्र सालने लगी।।

गुरु जी ने तो ऋतुराज का
रूदन कहा(भूमि से विदाई का)
किन्तु मैंने निर्भीक हँसी देखी
बदतमीजी मानवता की है
अम्लीय-वर्षा ओलावृष्टि देखी।।

प्रकृति अजेय है
एक ही मार्ग है इसे विजित करने का
कि विजित होने की अभिलाषा त्याग
प्रकृति को महत्ता देकर छायादार वृक्ष लगाए जाएं
जल-संरक्षण किया जाए।।

और जो अमीर एयर-कंडीशनर से
अपने को शीतलता प्रदान कर रहे हैं
उनसे टैक्स लेकर वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाए
तब यथार्थ साम्यवाद स्थापित होगा अन्यथा नही।।

प्रकृति के प्रकोप तब जाकर
कम प्रभावी होगी।।


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