मातृ-बोध!
नमन-नमन हे मातृ नमन
तुमको अर्पित है ये जीवन
तुमसे ही हैं सारे उपवन
नभ-जल-थल में तुम ही तुम।
ये शीश तुम्हारे चरणों में
गर अर्पित कर दे मेरी प्यारी
फिर भी कर्ज रहेगा बाकी
सहस्त्र जन्मो में भी माता
तुमसे निर्वाण असम्भव है।।
कण-कण अपना अर्पित करके
निर्माण किया तुमने ये तन
तुमही तो भारत माता हो
जननी हो विश्वविधाता हो।।
माँ हरपल तेरी गोद मे
ही रहते तेरे पुत्र सभी
हे माँ! हमसब वीर बने
मानवता का उद्धार करे
वन्दन है तुमको क्षण-प्रतिक्षण।।
गर उठी किसी की आंख तुमपर
सर-कलम तो उसका निश्चित है
दुष्टों को निर्वासित कर
ये राष्ट्र अमर हो,है ऐसा प्रण!
नमन-नमन है मातु नमन....
अहिंष्य
तुमको अर्पित है ये जीवन
तुमसे ही हैं सारे उपवन
नभ-जल-थल में तुम ही तुम।
ये शीश तुम्हारे चरणों में
गर अर्पित कर दे मेरी प्यारी
फिर भी कर्ज रहेगा बाकी
सहस्त्र जन्मो में भी माता
तुमसे निर्वाण असम्भव है।।
कण-कण अपना अर्पित करके
निर्माण किया तुमने ये तन
तुमही तो भारत माता हो
जननी हो विश्वविधाता हो।।
माँ हरपल तेरी गोद मे
ही रहते तेरे पुत्र सभी
हे माँ! हमसब वीर बने
मानवता का उद्धार करे
वन्दन है तुमको क्षण-प्रतिक्षण।।
गर उठी किसी की आंख तुमपर
सर-कलम तो उसका निश्चित है
दुष्टों को निर्वासित कर
ये राष्ट्र अमर हो,है ऐसा प्रण!
नमन-नमन है मातु नमन....
अहिंष्य
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