भारती!

फट रही है पौ
हिमालय गा रहा गीत इक।।

कश्मीर से कन्याकुमारी
बह रही है गीत प्यारी
तुम भी सुन लो,मैं भी सुन लूं
गान ये अद्भुत यहाँ।।

जो हैं अज्ञानी यहाँ
ओछी है जिनकी-प्रवृत्ति
उनको भी तुम करुणा दे दो
प्रेम से भर दो हृदय।।

बेटियों और माओं को
सम्मान देकर प्यारे तुम
करो फ़र्ज़ अदा तुम
माँ भारतीय स्वभाव का।।

निश्चित ही ये होगा
हो रहा है और हुआ भी है!
विश्व के हो मार्गदर्शक तुम,
शांति के हो अग्रदूत ।।

समृद्धि होगी धरा पर
संगठित ज्यों ही हुए तुम
एक भारत-भारतीय के
अतिरिक्त कुछ नही हो तुम।।

बह चुका है तमस सारा
खिल-रही है ज्योत्सना
आ रहा है विश्व भारत
को बनाने गणपति!

सुन लो प्यारे,गुण लो प्यारे
आ गयी समृद्धि अब!!




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