मुक्तिबोध!
बेवजह-सी छटपटाहट है
तुम्हारे विरह में प्रिय।।
महसूस तो तुम हो ही,
आती-जाती साँस के साथ।।
फिर मुझे पता करना है
कि ये छटपटाहट हैं क्यों आखिर।।
जीवन का अगला-क्षण कैसा होगा
अनुभूति का विषय है ये।।
निःसंदेह ये छटपटाहट उधर भी है
मैं आँखों से अपनी देख सकता हूँ।।
जब तय है अब की तुम मात्र 'याद' ही हो
तो क्यों न कर समझौता इनसे मैं
भी मुक्त हो ही जाऊं!
कोई प्रणय निवेदन नही
मेरी दुनिया मेरे भीतर ही है।।
तुम जहां भी रहो
प्रसन्नचित रहो! मेरा क्या?
अभी जख्म नया है-पुराना हो जाएगा!
वक़्त-दर-वक़्त
कारवाँ गुजर ही जायेगा!
तुम्हारे विरह में प्रिय।।
महसूस तो तुम हो ही,
आती-जाती साँस के साथ।।
फिर मुझे पता करना है
कि ये छटपटाहट हैं क्यों आखिर।।
जीवन का अगला-क्षण कैसा होगा
अनुभूति का विषय है ये।।
निःसंदेह ये छटपटाहट उधर भी है
मैं आँखों से अपनी देख सकता हूँ।।
जब तय है अब की तुम मात्र 'याद' ही हो
तो क्यों न कर समझौता इनसे मैं
भी मुक्त हो ही जाऊं!
कोई प्रणय निवेदन नही
मेरी दुनिया मेरे भीतर ही है।।
तुम जहां भी रहो
प्रसन्नचित रहो! मेरा क्या?
अभी जख्म नया है-पुराना हो जाएगा!
वक़्त-दर-वक़्त
कारवाँ गुजर ही जायेगा!

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