नशा!I
मैं क्यों लिखता हूँ
इसलिए कि जिस पुनरावृत्ति से मैं परेशानी में पड़ा
वो मेरे पाठकों को न उठानी पड़े!
एक सहज इंसान हूं कि नही ये मैं कैसे उद्घोष करूँ
किन्तु सहज-सरल-विनीत बनने के मार्ग मे जो चौराहें आते हैं वहाँ मैं आपका मार्गदर्शक बन सकूँ!
और एक सत्य,मेरी अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति जीनियस हैं
और किसी को मैं कुछ सीखा पाऊँ इस भाव से नही लिखता हूँ!
जैसे कुतिया अपने पिल्लों को भोजन उल्टी कर खिलाती है, मैं भी विचारों की उल्टी करता हूँ ताकि दस्त न हो!
मेरे होने तक ही
या मेरे जाने के बाद
एक बड़ी संख्या जागृत हो रही है
एवं होगी भी!
इसमे मेरा कोई श्रेय नही हैं!
मैं मात्र एक अनुवादक हुँ,
और एक धोबी भी हूं
जो कहने से गधे पर नही बैठता अपितु
अपने-आप बैठ जाता हैं,मैं वहीं बैठ भी पाता हूँ
जहाँ जागृति होने की सम्भावना होती है!
मैं विचित्र धोबी हूँ
मैं कपड़ा नही धोता,
मन-के-मैल को धोता हूँ
जिससे कि आप खुद से मिल लें!
औऱ ज्योंही आप जागृत हुए
मैं स्थुल रूप से अदृश्य होकर
चेतन-रूप में सर्वस्व व्यापित हो जाता हूँ।
तुम्हारी नसों में आत्मबोध का एक नशा चढ़ता हैं जो
आपके अध्य्यात्मिक जीवन को सुद्रढ़ बना देती हैं
औऱ ये नशा आपको पार लगाकर छुड़ेगा।
इसलिए मेरी संगति में मत आना,
नही तो लोग तुम्हे पहचान नही पाएंगे! इतने परिवर्तन होंगे तुम्हारे जीवन मे!
इसलिए कि जिस पुनरावृत्ति से मैं परेशानी में पड़ा
वो मेरे पाठकों को न उठानी पड़े!
एक सहज इंसान हूं कि नही ये मैं कैसे उद्घोष करूँ
किन्तु सहज-सरल-विनीत बनने के मार्ग मे जो चौराहें आते हैं वहाँ मैं आपका मार्गदर्शक बन सकूँ!
और एक सत्य,मेरी अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति जीनियस हैं
और किसी को मैं कुछ सीखा पाऊँ इस भाव से नही लिखता हूँ!
जैसे कुतिया अपने पिल्लों को भोजन उल्टी कर खिलाती है, मैं भी विचारों की उल्टी करता हूँ ताकि दस्त न हो!
मेरे होने तक ही
या मेरे जाने के बाद
एक बड़ी संख्या जागृत हो रही है
एवं होगी भी!
इसमे मेरा कोई श्रेय नही हैं!
मैं मात्र एक अनुवादक हुँ,
और एक धोबी भी हूं
जो कहने से गधे पर नही बैठता अपितु
अपने-आप बैठ जाता हैं,मैं वहीं बैठ भी पाता हूँ
जहाँ जागृति होने की सम्भावना होती है!
मैं विचित्र धोबी हूँ
मैं कपड़ा नही धोता,
मन-के-मैल को धोता हूँ
जिससे कि आप खुद से मिल लें!
औऱ ज्योंही आप जागृत हुए
मैं स्थुल रूप से अदृश्य होकर
चेतन-रूप में सर्वस्व व्यापित हो जाता हूँ।
तुम्हारी नसों में आत्मबोध का एक नशा चढ़ता हैं जो
आपके अध्य्यात्मिक जीवन को सुद्रढ़ बना देती हैं
औऱ ये नशा आपको पार लगाकर छुड़ेगा।
इसलिए मेरी संगति में मत आना,
नही तो लोग तुम्हे पहचान नही पाएंगे! इतने परिवर्तन होंगे तुम्हारे जीवन मे!

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