रोग!

मुझे रोग है,
भारत के रोग जैसा
५.५ टैबलेट रात्रि
३.५ सुबह, और १ दोपहर!

उसके बाद भी नींद नही
मेरा परिवार मुझे,मनोवैज्ञानिक
मनोचिकित्सक के पास लेकर जाता है!

और वो चिकित्सक मुझे
दवाएँ देता है,जब दवाएँ प्रभावित
कर मुझे अपाहिज बना देती हैं
तब मेरे अपने चैन की नींद सोते है!

फिर भी कांपती शरीर के
साथ मैं हौसले को बुलंद रखता हूँ
और मुझे बस अनुग्रहपूर्ण रहना आता है
चाहे कोई विष दे,अपशब्द कहे
सबके प्रति अनासक्त अनुग्रहपूर्ण रहना है मुझे!

क्योंकि इसी जीवन मे मुझे मोक्ष मिलना
निश्चित है,सारे जन्मों के कुकर्मों के
प्रतिफल मुझे इसी जन्म में भोग!
आवागमन से मुक्त होना हैं!

कुछ लोग मुझे पागल भी कहते हैं
मैं उसे भी स्वीकार करता हूँ
पा-पाने के लिए
ग-गतिशील है जो व्यक्ति
ल-लक्ष्य!

दरसल कोई मुझे क्या दे सकता है
जब सृस्टि के जनक ही मेरे पालक हैं!

इस दुनिया के अबतक की यात्रा में मिले
प्रत्येक व्यक्ति को अनुग्रह! सृस्टि के प्रत्येक कण-क्षण-स्थान
सबको अनुग्रह!

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