सांस में तुम!

हा तुम्हारी याद में मैं
निर्जन जगहों पर जाकर
उनको खुद से सम्बंधित करता हूँ।

रोने देता हूँ खुद को
बहने देता हूँ तुमको
अवरुद्ध नही करता तुमको
खुद में जीने देता हूँ तुमको।

कहां विरह, कैसी विरह
एक क्षण भी अलग हुए अगर
तब न है विरह, तुम सांस-सांस
चलते हो,मुझमे रहते, हो बिखरते हो, सिमटते हो।।

तुम अद्भुत अनुभूति हो
प्राणों की आहुति हो
जीवन को जीवट कर के प्रतिपल
सहते रहते हैं,और कुछ कहते रहते हैं।।

नियंत्रण है क्या किसी का
 एक कण पर भी,यहाँ तो सब
सतरंज के मोहरे हैं जिसका
नियंता सारी चालें चलता
कभी गम भी देता है,कभी खुश भी कर देता
और कभी जीवन ही ले लेता।।

फिर कैसे करूँ दोषारोपण खुद पर
या तुम पर या नियति पर
बस नही मेरा उसपर
हाँ तुम्हे सांसों में जीने का हक़ है मुझे
और उससे किसी को कोई कष्ट भी नही होगा।।



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