माया!

कुछ तो हो तुम,सबब या सबक!
कि तुम्हारी स्मृति प्रत्यक्ष  होते ही
बरबस नयन अश्रुपूरित होता जाता है!

सबक या सबब
लाघव या अतिरेक कुछ तो है तुमसे सम्बंधित मेरा!
इतने अरषों तक एक भी सांस तुम्हारे बगैर नही!

मेरे विश्लेषण में तुम मध्या हो!
उत्तप्त-छाँव की सन्ध्या हो!
जीवंत जगत की माया भी!
जो मुक्त करे वो काया भी!

Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!