प्रेयसी तो तुम ही हो न!
मोहब्बत कुछ इस तरह है
तुमसे मेरी! कि पहली नजर
में ही मैं परिवर्तित हो गया
यूँ तो अब मुझे सबमे खुदा दिखते हैं।।
किन्तु श्रेय तो तुम्हे है
कि जबसे तुम्हे देखा,पहली दफा ही
कुछ कहा भी नही तुमसे कभी
कभी भरी नज़र से देखा भी नही तुम्हे
किन्तु श्रेय तुम्ही को है
कि तबसे कण-कण-कृष्ण
क्षण कृष्ण, हे देवी हे दिव्य!
प्रारंभ तुमसे ही हुआ
नही तो घमण्ड अकड़ इत्यादि
दुर्गुण थे मुझमे जो प्रतिपल विलीन हुए
श्रेय तो तुम्हे है! प्रेरक तुम्ही रही
मैं कभी बन्धन नही बांधना चाहा
किन्तु श्रेय तो तुम्ही को है!
जब भी तुम स्मृति-समक्ष होती हो
मैं तुम्हे भेजने के लिये कृष्ण को
धन्यवाद दे देता हूं!
मैं बन्धन में तो नही हूँ
किन्तु निःबन्ध भी तो तुमसे ही हुआ
तुम्हे देखने से हुआ!
श्रेय तो तुम ही हो!
कि समस्त भय विसर्जित हो
गया,श्रेय तो तुम्हे ही है
कि कितने भी खूंखार लोग हो या जानवर भी
मुझसे प्रेम से लिपट जाते हैं
मैं सबके काम आ पाता हूँ
निःस्वार्थ श्रेय तो तुम ही हो!
मैं धरती का बोझ नही रहा
धरा भी मेरी माँ हो गयी
श्रेय तो तुम ही हो!
मुझे बस वही मिला
न मिलन-न जुदाई
एक महामिलन! जिससे मैं
सारे मिलन को प्राप्त किया
श्रेय तो तुम ही हो न!
प्रारम्भ तो तुम ही हो न
मेरे जागृति का,श्रेय तो तुम ही न हो
तुम जहाँ भी रहो जैसे भी
रहो पुर्ण रहो प्रसन्न रहो!
यशस्विनी रहो!
किन्तु श्रेय तो तुम ही हो न!
कहते हैं लोग कहते सुना है मैंने
प्रेम अंधा,प्रेम बन्धन प्रेम माया
किन्तु श्रेय तो तुम ही हो न
कि जी भर के देखा भी नही तुम्हे
और प्रेम-दृष्टि प्रेम-सत्य प्रेम-शिव प्रेम-सुंदर
श्रेय तो तुम ही हो न
प्रारंभ तो तुमसे ही हुआ न सब
इसलिए अनुग्रह तुमको!
तुमसे मेरी! कि पहली नजर
में ही मैं परिवर्तित हो गया
यूँ तो अब मुझे सबमे खुदा दिखते हैं।।
किन्तु श्रेय तो तुम्हे है
कि जबसे तुम्हे देखा,पहली दफा ही
कुछ कहा भी नही तुमसे कभी
कभी भरी नज़र से देखा भी नही तुम्हे
किन्तु श्रेय तुम्ही को है
कि तबसे कण-कण-कृष्ण
क्षण कृष्ण, हे देवी हे दिव्य!
प्रारंभ तुमसे ही हुआ
नही तो घमण्ड अकड़ इत्यादि
दुर्गुण थे मुझमे जो प्रतिपल विलीन हुए
श्रेय तो तुम्हे है! प्रेरक तुम्ही रही
मैं कभी बन्धन नही बांधना चाहा
किन्तु श्रेय तो तुम्ही को है!
जब भी तुम स्मृति-समक्ष होती हो
मैं तुम्हे भेजने के लिये कृष्ण को
धन्यवाद दे देता हूं!
मैं बन्धन में तो नही हूँ
किन्तु निःबन्ध भी तो तुमसे ही हुआ
तुम्हे देखने से हुआ!
श्रेय तो तुम ही हो!
कि समस्त भय विसर्जित हो
गया,श्रेय तो तुम्हे ही है
कि कितने भी खूंखार लोग हो या जानवर भी
मुझसे प्रेम से लिपट जाते हैं
मैं सबके काम आ पाता हूँ
निःस्वार्थ श्रेय तो तुम ही हो!
मैं धरती का बोझ नही रहा
धरा भी मेरी माँ हो गयी
श्रेय तो तुम ही हो!
मुझे बस वही मिला
न मिलन-न जुदाई
एक महामिलन! जिससे मैं
सारे मिलन को प्राप्त किया
श्रेय तो तुम ही हो न!
प्रारम्भ तो तुम ही हो न
मेरे जागृति का,श्रेय तो तुम ही न हो
तुम जहाँ भी रहो जैसे भी
रहो पुर्ण रहो प्रसन्न रहो!
यशस्विनी रहो!
किन्तु श्रेय तो तुम ही हो न!
कहते हैं लोग कहते सुना है मैंने
प्रेम अंधा,प्रेम बन्धन प्रेम माया
किन्तु श्रेय तो तुम ही हो न
कि जी भर के देखा भी नही तुम्हे
और प्रेम-दृष्टि प्रेम-सत्य प्रेम-शिव प्रेम-सुंदर
श्रेय तो तुम ही हो न
प्रारंभ तो तुमसे ही हुआ न सब
इसलिए अनुग्रह तुमको!



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