साथी..११

मेरी इस अनन्त चेतन यात्रा में साथी,मात्र तुम ही नही हो;
अपितु अंनत परिस्थितियों में अनन्त लोग हैं।
किन्तु तुम भी हो,तुम भी हो उनमे से एक जिनके साथ मेरी चेतना पूर्ण प्रस्फुटित होती है।
मेरे अनुमान में तुम ही हो जो मुझे अनन्त जन्मों से मुकम्मल करते आयी हो।
ये साथ स्थूल रूप से तो द्वैत प्रतीत होता है,किन्तु है नही द्वैत।
निश्चित उद्घोष है मेरा ये कि मैं परमात्मा के निकट पहुंचा बिना परिश्रम के,उसमे तुम्हारा निःस्वार्थ प्रेम सहायक हुआ।
तुम मुझमे सांस लेती हो,और मैं तुममें समाहित हूँ..

अब हम अद्वैत हो गए..
मैं औऱ तुम इस जीवनरूपी रंगमंच के पात्र मात्र है..
कबतक कहां तक इन प्रश्नों से बहुत दूर.. जन्नत के सरोवर में
एक नौका पे बैठे हम,चांदनी चमकती तारों वाली रात्रि में प्रेम के बहाव में बह रहे हैं!

दूर शहर में लोगों में उपद्रव मचा हुआ है।
शुक्र है कि हम दूर है सरोवर रूपी परमात्मा के आश्रय में अभय होकर।आधे तुम आधा मैं डोर कृष्ण की और पूरे हुए हम।






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