एक खत उन्हे भी!

ये लेख मैं उनको सपर्पित कर रहा हूँ जिनका श्रेय अत्यधिक है मेरे होने मे!
कभी-कभी जानकर
कभी-कभी अनजान बनकर
मैंने जिन लोगों को प्रताड़ित किया
और प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझे स्नेह के अतिरिक्त,
दुआओं के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिया!

वो प्रताड़ना मैं महसूस करता हूं कि कितनी
पीड़ादायक रही होगी,उसका प्रतिफल तो मुझे मिला ही
और शेष भी मिलेगा किन्तु उनलोगों के स्नेहवत व्यवहार ने
मुझे बहुत कुछ सिखाया!

करुणा, दया,प्रेम,सौहार्द, सामंजस्य, क्षमा, दानशीलता इत्यादि मानवीय मूल्यों का जो भी अंश कालांतर में विकसित हुआ,निश्चित ही ये उन्ही लोगों की देन है।

और उस प्रत्येक शख्स को मैं आभार करता हूँ,उनके चरणों की वंदना करता हूँ।
देर अबेर मेरा ये लघु-लेख उनतक पहुंचेगा, मैं धन्य हूँ, मैं धन्यवाद भी देता हूँ योगेश्वर को, कि इतनी भारी-भारी त्रुटियो के बाद भी मुझे जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो रही है।

लेख का समापन एक मशहूर कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से-

अब सबसे पूछता हूँ बताओ तो कौन था,
वो बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जिया।

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