विरह वेदना! लड़कियों की!
प्रेम में ठुकराई गई लड़कियां
लड़कों की तरह नही पीती दारू
नही बकती गालियां
नही निकालती भड़ास
नही करती किसी को बदनाम
वो बस चुपचाप सिमट
जाया करती है अपनी आत्मा
के गहरे उदास समुच्चय में!
प्रेम में ठुकराई लड़कियां
करती है घर के सारे काम अनवरत
जैसे पृथ्वी घूमती है अपने अक्ष पर
रहती है साथ में घर से निर्लिप्त व निरपेक्ष!
अगर भूल से भी माँ सिर पे हाथ फैर दे तो
फूट पड़ती है रुलाई और बना देती है
कोई बहाना!
प्रेम में ठुकराई लड़कियां
भीग जाने के डर से नही लगाती
आंखों में काजल!
उनके दिल की गिरहों की तरह
उलझे रहते हैं उनके बाल!
रात को सोते वक़्त भिगोती
है तकिया!
कचोटती है अपनी आत्मा को
नजरअंदाज करती है अपने जिस्म पे
पड़ी छल की निशानियों को
नफ़रत करती है अपने जिस्म के
उभारों से!
नही कर पाती फिर जीवन भर भरोसा
प्रेम नामक चिड़िया पर!
प्रेम में ठुकराई लड़कियां
झेलती है चन्द्रमुखी सी
आत्मप्रवंचना!
सहती है राधा व मीरा सा
विरह!
बड़ी अजीब सी होती है ये
प्रेम में ठुकराई गई व छली गई
लड़कियां,,,!!
Comments
Nice playing with words and true combination with feeling .