अनाम यात्रा रहस्य!
तुम्हें लिखूँ या त्याग दूँ, त्यागना तो मुश्किल है फिलहाल। 13 वर्ष हो गए जबसे मैं आपको जानता हूँ।
इन वर्षों में कभी भी वासना की एक बूँद भी निर्मित नही हुई। मात्र प्रेम,मात्र साहचर्य, मात्र समर्पण। भोर का सूर्य रजनी में नहाकर निकलर ही प्रभाकर होता है।
ये मेरे लिये मीमांसा है,आपका साथ दर्शन है एक अन्यत्र जगत का। ये साथ मुझे मुझसे मिलाकर मुझसे मुझको ही छीन लिया।
क्यों,आखिर क्यों ये अभी भी अज्ञात है,हाँ किन्तु एक किरण है जो अत्याज्या आध्यात्मिक है..जो मुझे,मेरी आत्मा को मजबूर करती है इस पथ पर चलने को।
मैं स्वयं को ही पुनरुक्त करने की कोशिश करता हूँ कि आखिर इतना बड़ा अचरज हो कैसे रहा है। क्या हमारा पुनर्जन्म हुआ है। या कुछ शेष रहा जिसे अशेष होना है। क्या आप माँ शारदा हैं।
इस कहानी का आदि कहा हैं,हम मध्य मे मिले या हमारा आदि मिलन हुआ इत्यादि सैकड़ों प्रश्न। मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ,मैं खुद ही खुद को नही रोक पाता, क्या आप जादूगर हैं...
अक्सर इन बातों का उत्तर मस्तिष्क देने में असमर्थ हो जाता है।
सिर भारी हो जाता है। हाँ, आत्मा बिलकुल सहज उत्तर दे देती है। फिर भी आखिर क्यों, क्यों और क्यों...
मेरे जैसा वासनाओं से युक्त व्यक्ति मुक्त क्यों होता है आपके समक्ष। आख़िर क्यों। मुझे मेरा फरिश्ता कब मिलेगा जो मुझे पैगम्बर बनायेगा। कब...प्रतीक्षारत हूँ मैं बहुत ही धैर्य से।
हे राम! मुझे समझाइए,मुझे बोध कराइये।
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