अनाम यात्रा रहस्य..१
रवींद्रनाथ जी के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है।
एक साधक या ईश्वर-प्रेमी ईश्वर को बहुत तल्लीन होकर ढूंढता है; एक दिन अचानक वो ईश्वर के घर पहुंच जाता है; दरवाजे पर दस्तक देने ही वाला होता है।
उसके और ईश्वर के बीच बस एक खटखटाहट!
किन्तु वो दरवाजा खटखटाया ही नही,वापस लौट आया।
ये छोटी कहानी बहुत सार लिये हुए है। बौद्धों का बोधिसत्व भी बिलकुल इसी तरह हैं। विवेकानंद की ज्ञानप्राप्ति के उपरांत भी पुनर्जन्म की इच्छा भी बिलकुल यही है।
ये मेरे साथ भी हुआ,मैंने जिसको पूजा,जिसकी चाह बड़ी सिद्दत से की। उसे पाकर या पाने का अधिकारी होकर भी उसे त्याग दिया। ये वास्तविक क्रांति है जीवन की जो अनुभूत हुई...
शायद इस कहानी से ये रहस्य खुल जाए..किन्तु नही अब वास्तविक रहस्य तो मैं समझा ही नही सकता किसी को,आपको भी नही।
बस इशारा कर सकता हूँ,श्रम आपको करना होगा।
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