अकेलापन एक घाव!

जब मैं अकेला होता हूँ,
जब कोई नही होता है
मेरे एहसास में....
एक समुंदर में उतरता हूँ मैं
जिसका पानी खारा नहीं
मीठा होता है......

ये मीठा जल मेरे
समस्त कड़वे तमस को
समाहित कर ले जाता है स्वयं में....

और उस वक़्त मुझे
सबको त्याग कर..
अकेले और अकेले
बस अकेले चलने का जी होता है!

सारे रिश्ते मुझे स्वांग लगते है
उस वक़्त...जितना करीब रिश्ता
उतने ही जटिल घाव....

ये घाव ऐसे हैं जो मरहम से
नही वक़्त के साथ ठीक होते हैं...

घाव का डर नही मुझे
घावों से भरा इतिहास है मेरा
और घावों से भरा भविष्य भी होगा...

अकेलापन भी एक घाव ही है
एक विशिष्ट घाव...
काश! ज़िन्दगी भी माँ की तरह होती
सन्तोषी माँ की तरह...जिसने आजतक
मुझसे कोई शिकायत नही की!

किन्तु ये असम्भव है
ज़िन्दगी माँ नही अपितु
पिता की फटकार है फ़टकार...

ज़िन्दगी का भी कोई चरित्र नही
ज़िन्दगी चरित्रहीन है....एक तवायफ़ है...
जो बदलती रहती है बहती रहती है
कभी इस ओर कभी उस ओर...

ज़िन्दगी को फ़र्क़ नही पड़ता अकेलेपन से
दर्द से,उलाहनों से! ज़िन्दगी तो बस पीसती रहती है
नए-नए रंग से नए-नए ढंग से...

इस पीसती-पिसाती हुई ज़िन्दगी को
मेरे जैसे लोग ही जीते है
क्योंकि वो हज़ारों मौत रोज--
मरते जो हैं...ख्वाहिशों को दफ्न करके...


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